कुछ बदल गया
किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचिए जिसने तीस या चालीस साल काम किया और रिटायर हो गया। कोई दादा-दादी या नाना-नानी। कोई बुज़ुर्ग पड़ोसी। आपके माता-पिता की पीढ़ी का कोई व्यक्ति।
अपने कामकाजी जीवन के अंत में — क्या उनके पास अपना घर था? क्या वे छुट्टियों पर जाते थे? क्या उनकी शामें ख़ाली होती थीं? क्या वे रिटायर होते वक़्त कुछ बचा हुआ लेकर गए?
अब अपने माता-पिता के बारे में सोचिए, जब वे आपकी उम्र के थे। वही सवाल।
अब ख़ुद को देखिए। अभी। आज।
आपके पास अपना कितना है?
किराए पर नहीं। किस्तों में नहीं। अपना।
आप कितने थके हुए हैं — आज से नहीं, बल्कि इसके जमा होते जाने से? वह थकान जो अब वीकेंड पर भी नहीं जाती। वह जिसका अब एक नाम है: बर्नआउट। एक शब्द जो एक पीढ़ी पहले लगभग था ही नहीं, क्योंकि जो यह बयान करता है, वह भी एक पीढ़ी पहले लगभग नहीं था।
आपके पास कितना ख़ाली समय है — और जब होता है, तो उसमें से कितना वाक़ई ख़ाली होता है? या वह रिकवरी का हो जाता है? पीछे छूटे काम पकड़ने का? उस धीमी गुनगुनाहट का, जो कहती रहती है कि अभी भी बहुत कुछ करना बाक़ी है?
आपके अगले दस साल कैसे दिखते हैं?
वह वर्शन नहीं जो आप लोगों को बताते हैं। वह वर्शन जिसके बारे में आप रात में सोचते हैं। क्या वह प्रगति जैसा दिखता है? कुछ ऐसा जो किसी चीज़ की ओर बन रहा हो? या वह वही चीज़ दिखती है, दोहराई जाती हुई — उतना ही पैसा बाहर जाता हुआ, उतनी ही दूरी तय करनी बाक़ी, आप जहाँ हैं और जहाँ आपको अब तक होना बताया गया था, उसके बीच वही फ़ासला?
तीन पीढ़ियाँ। वही समझौता — काम करो, और तुम्हारा जीवन तुम्हारा होगा।
तब और अब के बीच कहीं कुछ बदल गया। काम आसान नहीं हुआ। घंटे कम नहीं हुए। उत्पादकता बढ़ी। तकनीक आई। सब कुछ तेज़ हो गया।
और फिर भी।
आपके दादा-दादी के पास एक कमाई पर अपना घर था। आप दो कमाइयों पर किराए पर रहते हैं। आपके दादा-दादी रिटायर हुए। आपको यक़ीन नहीं कि आप होंगे। आपके दादा-दादी के पास इतवार होता था। आपके पास इतवार की सुबह है, अगर बीच में कुछ न आ जाए।
किसी ने घोषणा नहीं की कि समझौता बदल गया है।
वह बस बदल गया।
सवाल यह है कि क्या यह संयोग से बदला।
Moving Truth